तराई में वन अधिकारी ठेकेदार बनकर कर रहे सरकारी खजाने की लूट, कागज़ी हरियाली के नाम पर करोड़ों हज़म, जंगल नहीं, भ्रष्टाचार उग रहा है
हुज़ूर…….तराई के हरे-भरे जंगल आज लुटेरों के कब्ज़े में हैं – फर्क सिर्फ इतना है कि इन लुटेरों के हाथ में कुल्हाड़ी नहीं, बल्कि सरकारी मुहर और कलम है। वन विभाग में बैठे मगरमच्छनुमा अफसर और वन रेंजर, जो जंगलों के रक्षक कहलाते हैं, वही अब इनके सबसे बड़े दुश्मन बन गए हैं।
जमीन पर उजाड़ – फाइलों में स्वर्ग
👉 जी हाँ…….. वानिकी कार्यों का सच बेहद चौंकाने वाला है। लाखों पौधे लगाने के दावे किए जाते हैं, पर हकीकत में गिनती के पौधे भी जिंदा नहीं मिलते। नहरों, सुरक्षा बाड़ और जल संरक्षण जैसे कार्य सिर्फ रिपोर्टों में ‘पूरा’ होते हैं। जमीनी दौरे पर सिर्फ सूखी मिट्टी और टूटी हुई आशाएं दिखाई देती हैं।
ठेकेदारी का भ्रष्ट तंत्र
सूत्रों के हवाले से सामने आया है कि कई वन अधिकारी खुद या अपने रिश्तेदारों के नाम पर ठेके ले रहे हैं। यानी आदेश भी वही दे रहे हैं, भुगतान भी खुद को कर रहे हैं, और काम कागज़ों में पूरा हो रहा है। ठेका कौन लेगा, कितना काम होगा और कितनी रकम किसकी जेब में जाएगी – सब पहले से तय रहता है।
आय से कई गुना संपत्ति – फिर भी सब खामोश
सूत्रों की माने तो तराई में कुछ वन रेंजर और अफसर इतनी आलीशान कोठियों, लग्ज़री गाड़ियों और जमीनों के मालिक हैं कि उनकी सरकारी तनख्वाह का हिसाब इनके आगे बौना पड़ जाता है। लेकिन जांच एजेंसियां ऐसे सो रही हैं मानो जंगल नहीं, कानून भी बिक चुका हो।
बंदरबांट का खेल – ऊपर से नीचे तक
हुज़ूर…….तराई के जंगल लूटने की यह कहानी सिर्फ निचले स्तर पर नहीं रुकती। ऊपर तक पूरा नेटवर्क फैला है। बजट आते ही पहले ‘हिस्सेदारी’ तय होती है, फिर कार्य योजना बनाई जाती है। जनता और जंगल – दोनों की चिंता करने वाला कोई नहीं।
अगर यही खेल चलता रहा, तो कुछ ही सालों में तराई के जंगल सिर्फ फोटोग्राफ और सरकारी भाषणों में रह जाएंगे। न हरियाली बचेगी, न वन्य जीव, और न ही आने वाली पीढ़ियों के लिए स्वच्छ हवा।
👉कल देखिए पर्यावरण प्रेमी एवं पत्रकार बलदेव सिंह की स्पेशल रिपोर्ट…..
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