रुद्रपुर में फलदार बाग उजाड़ा, 78 पेड़ों की बलि, विभागों की चुप्पी, हरियाली की हत्या या सरकारी मिलीभगत
रुद्रपुर, ब्यूरो रिपोर्ट।
जब शासन-प्रशासन पेड़ लगाने के लिए करोड़ों खर्च कर रहा है, ‘एक पेड़ माँ के नाम’ जैसे अभियान चला रहा है, तब रुद्रपुर जैसे शहर में फलदार पेड़ों की अवैध कटाई न केवल एक आपराधिक कृत्य है, बल्कि सरकारी तंत्र की असंवेदनशीलता और मिलीभगत का भी शर्मनाक उदाहरण है।
गंगापुर रोड स्थित फुलसुंगी क्षेत्र में खसरा संख्या 390 पर स्थित एक हरा-भरा बाग रातोंरात उजाड़ दिया गया। यहां आम के 70 और लीची के 8 पेड़ थे, सभी पूर्णतः स्वस्थ और उत्पादक अवस्था में। इस जमीन पर मालिकाना हक़ चन्द्रकांता सिंह पत्नी अमरनाथ सिंह का है। मगर अब यह उपजाऊ बाग समतल ज़मीन में तब्दील हो चुका है, जिसे कथित रूप से कॉलोनी बनाने की मंशा से साफ किया गया।
उद्यान विभाग की भूमिका संदेह के घेरे में
जानकारी के अनुसार, भू-माफिया ने पहले उद्यान विभाग से अनुमति लेने की कोशिश की थी। विभाग ने जांच कर पेड़ों को सुरक्षित बताते हुए अनुमति देने से इनकार कर दिया। लेकिन इसके बावजूद, 78 फलदार पेड़ों की कटाई हो गई, न सिर्फ छंटाई, बल्कि योजनाबद्ध रूप से पूरी जड़ों तक सफाया कर दिया गया।
यह सारा कृत्य विभागीय नज़र से बचा रह गया, या यूं कहें, जानबूझकर नजरअंदाज किया गया। खासकर तब जब यह पूरी घटना 31 जुलाई को सेवानिवृत्त हुए उद्यान अधिकारी प्रभाकर सिंह के कार्यकाल में हुई। स्थानीय लोगों का आरोप है कि यह साजिश उनकी मौन सहमति और अंदरूनी मिलीभगत से ही अंजाम तक पहुंची।
प्रशासन मौन, कॉलोनाइज़र सक्रिय
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि न उद्यान विभाग ने कार्रवाई की, न ही ज़िला प्रशासन या प्राधिकरण ने संज्ञान लिया। अवैध कॉलोनी बनाने की तैयारी खुलेआम जारी है। बुकिंग शुरू होने की सूचनाएं मिल रही हैं और सरकारी मशीनरी आंख मूंदे बैठी है।
जुर्माने से नहीं रुकेगी हरियाली की लूट
अब जब मामला उजागर हो चुका है, तो उद्यान विभाग केवल जुर्माना लगाकर खानापूर्ति की कोशिश कर रहा है। सवाल यह है कि क्या 78 फलदार पेड़ों की बेशकीमती हरियाली का मोल कुछ हज़ार रुपये का जुर्माना हो सकता है, या फिर दोषियों पर आपराधिक धाराओं में कार्रवाई की जाएगी।
एन जी टी विभाग से जाँच की मांग
स्थानीय निवासियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इस पूरे प्रकरण की एनजीटी (राष्ट्रीय हरित अधिकरण) से उच्चस्तरीय जांच की मांग की है। साथ ही, दोषियों पर कड़ी कानूनी कार्रवाई और ज़मीन के उपयोग को तत्काल प्रभाव से रोकने की मांग भी उठाई है।
क्या सिर्फ भाषणों तक सीमित रहेगा पर्यावरण संरक्षण
यह मामला उन तमाम सरकारी अभियानों पर सवाल खड़ा करता है जो पर्यावरण की रक्षा के नाम पर प्रचार करते हैं, लेकिन ज़मीनी स्तर पर नकारा साबित होते हैं। अगर ऐसे मामलों में सख्त उदाहरण नहीं बने, तो भविष्य में रुद्रपुर जैसे शहरों से हरियाली का नामोनिशान मिटने में ज्यादा समय नहीं लगेगा









